जानिए किन वजहों से हो रही कोरोना वायरस के शिकार मरीजों की मौत, बढ़ते जा रहे आंकड़ें

बर्लिन। दुनियाभर में कोरोना वायरस के संक्रमण से शिकार होने वालों की मौत रही है। इसको लेकर कई देश अपने यहां टीके का निर्माण करने में लग गए हैं। इतनी मौतों के बाद हर किसी के मन में ये सवाल उठना लाजिमी भी है कि आखिर कोरोना वायरस के शिकार होने वाले लोगों की इतनी जल्द मौत क्यों हो जा रही है? आखिर ये वायरस मनुष्य के शरीर में ऐसा क्या कर दे रहा है जिससे वो अधिक दिन तक जिंदा नहीं रह पाता है। इसी तरह की मौतों को केंद्रित करते हुए हाल ही में लांसेट पत्रिका में एक स्टडी छपी है जिसमें ये बताया गया है कि हर साल दुनिया भर में होने वाली मौतों में से एक चौथाई का कारण सेप्सिस होता है।

ये भी कहा जाता है कि यदि किसी संक्रमण के चलते व्यक्ति के शरीर का प्रतिरोधी तंत्र इतना ज्यादा सक्रिय हो जाए कि उसके कारण अंग ठीक से काम करना बंद कर दें तो ऐसी जानलेवा स्थिति को सेप्सिस कहते हैं। ऐसी खतरनाक प्रतिक्रिया के कारण शरीर के भीतर ऊतक नष्ट हो सकते हैं, ऐसे में शरीर के कई अंग काम करना बंद कर देते हैं जिससे उसकी मौत भी हो सकती है।

डोएचेविले वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार हाल ही में लांसेट पत्रिका में एक स्टडी छपी है जिससे पता चलता है कि हर साल दुनिया भर में होने वाली मौतों में से एक चौथाई का कारण सेप्सिस ही होता है। 2015 की रिपोर्ट देखें तो अकेले केवल जर्मनी में ही अस्पतालों में मरने वाले करीब 15 फीसदी लोगों की मौत का कारण सेप्सिस दर्ज किया गया जोकि तमाम तरह के खतरनाक कैंसर के कारण होने वाली मौतों से भी ज्यादा है। साइट की खबर के अनुसार जर्मन सेप्सिस फाउंडेशन की सलाह है कि लोगों को इन्फ्लूएंजा वायरस और न्यूमोकॉक्कस के खिलाफ टीका लगवाना चाहिए। कमजोर प्रतिरोधी तंत्र वाले नवजात बच्चों और डायबिटीज, कैंसर, एड्स और दूसरी गंभीर बीमारियों से ग्रस्त बुजुर्गों को तो इसका खास खतरा होता है।

क्या होते हैं सेप्सिस के लक्षण

डॉक्टरों का कहना है कि वायरस, बैक्टीरिया, फंगस या परजीवी जैसे तमाम तरह के रोगाणुओं के कारण सेप्सिस की शुरुआत होती है। न्यूमोनिया, किसी घाव में संक्रमण, मूत्रनली के संक्रमण या पेट के संक्रमण अक्सर सेप्सिस का कारण बनते हैं। कई आम मौसमी इन्फ्लूएंजा वायरसों के अलावा दूसरे तेजी से फैलने वाले वायरसों के कारण भी ऐसा होता है – जैसे कि आजकल कोरोना वायरस फैला हुआ है।

संक्रमण के आम लक्षणों के अलावा जो खास लक्षण सेप्सिस की ओर इशारा करते हैं वे हैं ब्लड प्रेशर में अचानक गिरावट आना और उसी के साथ दिल की धड़कन तेजी से ऊपर जाना, साथ में बुखार, भारी और तेज-तेज सांसें चलना और बहुत बीमार महसूस करना सेप्सिस के लक्षण होते हैं। इसके बाद अगला और गंभीर चरण होता है सेप्टिक शॉक, जिसमें ब्लड प्रेशर खतरनाक स्तर तक गिर जाता है, ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर इमरजेंसी सेवा की मदद लेनी चाहिए मगर लोग ऐसा भी नहीं कर पा रहे हैं जिससे मौत हो जा रही है।

सेप्सिस का इलाज?

अस्पतालों में सेप्सिस के खूब मामले सामने आते हैं लेकिन अक्सर इनका पता काफी देर से चलता है। पता चलते ही फौरन इसका इलाज शुरू किया जाता है। खून की जांच की जाती है। टीबायोटिक दवा दी जाती है और रक्त का प्रवाह और वेंटिलेशन बनाए रखने पर भी ध्यान दिया जाता है। कई बार तो सावधानी के तौर पर सेप्सिस के मरीजों को आर्टिफिशियल कोमा में डाल दिया जाता है। इस दौरान तमाम उपकरणों के माध्यम से मरीज के अंगों को बचा कर रखने की व्यवस्था की जाती है।

हर साल 24 अरब डॉलर हो रहे खर्च

इस तरह की गहन चिकित्सा ना केवल बेहद जटिल बल्कि बहुत ज्यादा महंगी भी होती है। केवल अमेरिकी अस्पतालों में ही हर साल इस पर 24 अरब डॉलर खर्च होते हैं लेकिन सच तो यह है कि अस्पतालों में सीमित बेड होने के कारण केवल गिने चुने मरीजों को ही आईसीयू की सुविधा दी जा सकती है। ऐसे में कोरोना वायरस जैसे संक्रमणों के कारण जिन मरीजों को सांस की गंभीर समस्या और सेप्सिस की संभावना बनती दिखे, उन्हें ही पहले आईसीयू में रखा जाता है, यही कारण है कि मौजूदा सिस्टम में कोरोना के हर मरीज को आईसीयू की सुविधा नहीं दी जा सकती और इसीलिए संक्रमण को रोकना ही ज्यादा से ज्यादा जानें बचाने का सबसे कारगर उपाय है।

लंबे समय तक दिखता है असर

एक राहत देने वाली बात यह है कि करीब आधे मरीजों में सेप्सिस के बाद आगे चलकर कोई गंभीर असर नहीं दिखता, वहीं दूसरे आधे मामलों में अस्पताल से छुट्टी मिलने के तीन महीने बाद जाकर मरीज को भयंकर संक्रमण, किडनी फेल या फिर कोई कार्डियोवैस्कुलर बीमारी हो जाती है। इसके अलावा सेप्सिस के कई मरीजों में आगे चलकर लकवा, अवसाद या घबराहट की परेशानी सामने आ सकती है, इसलिए सबसे जरूरी बात है कि किसी तरह से मरीज में सेप्सिस होने से बचाया जाए।

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