तेल के खेल में चल रहे सऊदी अरब और रूस के झगड़े से भारत उठा सकता है फायदा, जानें कैसे

नई दिल्‍ली। दो बड़े तेल उत्पादक देशों सऊदी अरब और रूस के इस झगड़े से भारत के लिए स्वर्णिम मौका आया है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 83 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। वित्त वर्ष 2018-19 में 112 अरब डॉलर का कच्चा तेल भारत ने आयात किया है। चालू वर्ष में जनवरी तक ही 87.7 अरब डॉलर का कच्चा तेल भारत खरीद चुका है। केयर रेटिंग के अनुसार कच्चे तेल के दाम में एक डॉलर की गिरावट से भारत के आयात बिल में 10,700 करोड़ की गिरावट आती है। यानी 30 डॉलर गिरावट का अर्थ सरकार के लिए तीन लाख करोड़ रुपये की बचत है। एक और रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार तेल के दाम में 10 डॉलर की गिरावट से भारत की महंगाई की दर में करीब एक फीसद की गिरावट संभव है।

कच्चा तेल सस्ता होने का मतलब यह भी है कि उद्योगों में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल सस्ता होना। हर फैक्ट्री में आने और वहां से निकलने वाला माल जिन ट्रकों पर ढोया जाता है, उनका किराया भी डीजल के दाम से ही तय होता है। सरकार तेल के मूल्यों में कटौती कर उपभोक्ताओं को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचा सकती है। भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार सुस्ती के दौर से गुजर रही है, जिसका प्रमुख कारण मांग में कमी है। ऐसे में सरकार डीजल और पेट्रोल के मूल्य को घटा कर लोगों की क्रय शक्ति बढ़ा सकती है। क्रयशक्ति में वृद्धि से अंतत: मांग उत्पन्न होगा, जो अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करेगा। फिलहाल पेट्रोल के मूल्य में 2.69 रुपये तथा डीजल के मूल्य में 2.33 रूपये की कटौती हुई है, परंतु मूल्य में गिरावट की तुलना में यह कटौती काफी कम है।

सरकार ने तेल के मूल्य गिरने के साथ ही डीजल व पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी में तीन रुपये प्रति लीटर वृद्धि कर दी है। यह बढ़ोतरी सीधे एक्साइज ड्यूटी में नहीं की गई है, बल्कि स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी और रोड इंफ्रास्ट्रक्चर से बढ़ाया गया है। इसका सीधा आशय यह है कि केंद्र सरकार को यह रकम राज्यों के साथ भी नहीं बांटनी होगी। यह पूरी रकम केंद्र सरकार के खाते में ही रहेगी। सरकार की तरफ से कहा गया है कि इस पैसे से उसे इंफ्रास्ट्रक्चर और दूसरे विकास कार्यो पर खर्च के लिए जरूरी रकम मिलेगी। अगर सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी खर्चा करती है, तो भी कई क्षेत्रों में मांग उत्पन्न होती है, जिससे अर्थव्यवस्था को गति मिल सकती है।

भारत अधिकांश तेल का आयात करता है, इसलिए दाम घटने पर उसे कुछ समय तक लाभ जरूर प्राप्त होगा। कुछ वक्त के लिए ये भारत की अर्थव्यवस्था, वित्तीय घाटा और चालू घाटे के लिए अच्छा रहेगा, लेकिन ज्यादा लंबे समय तक यही स्थिति बरकरार रही, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर मंदी की आशंका मंडराने लगेगी। ज्यादा समय तक दाम में गिरावट का असर उन एक करोड़ के करीब भारतीयों पर भी पड़ेगा जो ओमान, बहरीन, कतर, सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों में रहते हैं। सभी खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था तेल पर आधारित है। तेल के दाम लगातार कम होने से वहां कंपनियां बंद होने की तरफ अग्रसर होंगी, जिससे बेरोजगारी में भी वृद्धि होगी। इसका प्रभाव वहां रहने वाले भारतीयों पर भी पड़ेगा, जिससे भारत भेजी जाने वाली कमाई पर भी असर पड़ेगा।

यानी यह भारतीय अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करेगा, क्योंकि हाल के वर्षो में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर बन चुका है। ऊर्जा क्षेत्र में इस सुस्ती ने 2014-16 की स्थिति की वापसी कर दी है, जिसमें दर्जनों बड़ी ऑयल और गैस कंपनियां बंद हो गई थीं और लाखों लोगों की नौकरी चली गई थी।

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