त्याग, समर्पण व ममता की प्रतिमूर्ति जीवनदायिनी माँ

– दीपक कुमार त्यागी
हमारे देश की प्राचीन गौरवशाली संस्कृति में वैसे तो माँ आदिकाल से ही पूज्यनीय रही है उसके लिए हमको मातृ-दिवस के एक दिन इंतजार करना आवश्यक नहीं है। लेकिन पश्चिमी संस्कृति से प्रभाव के चलते अब भारत में भी प्रत्येक वर्ष मातृ-दिवस मई महीने के दूसरे रविवार को जोरशोर से मनाया जाने लगा है। जो कि इस वर्ष 10 मई को पड़ रहा है। हमारे रोजमर्रा के जीवन की बेहद कटु सच्चाई यह हो गई है कि आजकल के भागदौड़ भरे व्यस्त समय में मातृ-दिवस ही वह महत्वपूर्ण अवसर होता जा रहा है, जब बच्चा अपनी माँ के प्रति अपनी भावनाओं व प्यार को व्यक्त करता है। लेकिन इस वर्ष लॉकडाउन के चलते बच्चों का माँ के प्रति प्रेम और अधिक प्रगाढ़ हुआ है।

जीवन में माँ के नजरिए से देखें तो अपने बच्चों के लिए माँ के लिए तो हर दिन ही जीवन का बहुत महत्वपूर्ण दिन होता है। वैसे तो इस दिन को ‘मदर्स डे’ के नाम से विदेशों में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है परंतु अब मातृ-दिवस का भारत में भी अपना एक विशेष महत्व हो गया है। क्योंकि आजकल हम लोग पश्चिमी सभ्यता से बहुत जल्द प्रभावित होते है और उसकी नकल करने में माहिर हो गये साथ ही साथ यह भी कटु सत्य है कि हम लोग अपने काम में इतने व्यस्त हो गए हैं कि अपने माता-पिता के लिए अब समय ही नहीं निकाल पाते हैं। यही कारण है कि आजकल बच्चे मातृ-दिवस के नाम पर ही सही लेकिन अपने व्यस्त जीवन से कुछ समय निकालकर अपनी उस माँ को देते हैं जिस मां ने कभी भी एक पल के लिए भी यह नहीं सोचा था कि मेरे पास अपने प्यारे बच्चों के लिए समय नहीं है। आज हम बच्चे उसको समय देने की सोचते हैं।

हालांकि संसार में “मातृ-दिवस” मनाने की शुरुआत कब हुई होगी, इसको लेकर लोगों के अलग-अलग मत है लेकिन कुछ इतिहासकारों के अनुसार “मातृ-दिवस” मनाने का शुरुआत सर्वप्रथम ग्रीस देश में हुई थी, जहां देवताओं की माँ को पूजने का चलन शुरु हुआ था। इसके बाद इसे वहां पर इसको त्योहार की तरह मनाया जाने लगा और अब यह धीरे-धीरे सम्पूर्ण विश्व में पैर पसार चुका है। कटु सच्चाई यह है कि जीवन में सच्चे निस्वार्थ भाव से बच्चों के प्रति माँ के अनमोल प्रेम व योगदान की वजह से ही आज बच्चों के द्वारा सिर्फ “मातृ-दिवस” पर ही नहीं बल्कि रोजाना अपनी पूज्यनीय माँ का आदर सम्मान उनकी जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए, उनको समय देना चाहिए।

विश्व में माँ ही एक ऐसा शब्द है जिसे दुनिया में कदम रखने वाला हर बच्चा अपने मुंह से इस दुनिया में आने के बाद सबसे पहले लेता है। इस धरातल पर माता जी व पिता जी के रूप में ही साक्षात उस भगवान से मुलाकात होती है जो स्पष्ट रूप से नजर आते हैं जो अपने बच्चों को बिना किसी स्वार्थ के पालते है, पढ़ाते लिखाते है और हमेशा भगवान से यही प्रार्थना करते हैं की हमारे बच्चों पर कोई कष्ट ना आये और उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में जबरदस्त सफलता के साथ उनका मुकाम हासिल हो। माँ के बिना जीवन की उम्मीद भी नहीं की जा सकती, अगर माँ न होती तो दुनिया में हमारा भी अस्तित्व न होता। इस दुनिया में माँ दुनिया का सबसे सरल शब्द है जिसमें जीवन देने वाले भगवान साक्षात खुद वास करते हुए बच्चों का लालनपालन करते हैं।

ब्रह्मांड में एक माँ का रिश्ता ही ऐसा होता है जिसमें माता बिना किसी लोभ-लालच के अपने बच्चों के लिए हर समय कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहती है। यह बात केवल इंसानों में ही नहीं बल्कि जल, थल व वायु में पाये जाने वाले हर प्रकार के जीव-जंतु में यही होता है। अगर अपने बच्चों पर कोई खतरा या आंच आने वाली होती है तो माँ ही सबसे पहले आगे आकर खतरें को अपने ऊपर ले लेती है और बच्चों के जीवन को सुरक्षित रखने के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर देती है।

वैसे अक्सर कहा जाता है कि दुनिया में सबसे अनमोल निस्वार्थ भाव का रिश्ता एक माता का अपने बच्चों से होता है। एक बच्चे का जब जन्म होता है, तो उसका पहला रिश्ता माँ से होता है। एक माँ अपने बच्चे को पूरे 9 माह अपनी कोख में रखने के बाद असहनीय पीड़ा सहते हुए उसे जन्म देती है और इस दुनिया में लाती है। इन नौ महीनों में बच्चे और माँ के बीच एक बेहद भावनात्मक, अदृश्य प्यार भरा बहुत ही गहरा रिश्ता बन जाता है। यह रिश्ता बच्चे के जन्म के बाद जब साकार होता है, तो उसके बाद ताउम्र जीवन पर्यन्त अपने बच्चों से बना रहता है। माँ का अपने बच्चों से रिश्ता इतना प्रगाढ़ और निस्वार्थ प्रेम से भरा होता है, कि बच्चे को जरा ही तकलीफ होने पर भी माँ बेहद बेचैन हो उठती है। वहीं तकलीफ के समय बच्चा भी सबसे पहले अपनी प्यारी माँ को ही याद करता है। बच्चे चाहे कितने ही बड़े हो जाये लेकिन उनके लिए माँ का दुलार और प्यार भरी पुचकार एक बहुत बड़ी सकारात्मक उर्जा व कारगर औषधि का काम करती है, वह उनके जीवन में नयी ऊर्जा का संचार कर देती हैं।

इसलिए ही अक्सर कहा जाता है कि इस दुनिया में अगर कही जन्नत है तो वो ईश्वर रूपी साक्षात माँ के चरणों में व उसके आचल की छांव में होती है। इसलिए ही माता व बच्चों के ममता और स्नेह के इस अनमोल रिश्ते को संसार का सबसे खूबसूरत रिश्ता कहा जाता है। हकीकत में दुनिया का कोई भी रिश्ता इतना प्यार भरी भावनाओं से युक्त, मर्मस्पर्शी और निस्वार्थ पूर्ण नहीं हो सकता है, जितना किसी माँ का अपने बच्चों से होता है।

अपने बच्चों के प्रति माँ बहुत ही संवेदनशील होती है, माँ को अपने बच्चों के भविष्य की सबसे ज्यादा चिंतित होती है, मगर जब पता चलता है की उसका बच्चा गलत रास्ते पर चल निकला है तो माँ ही एक गुरु की तरह उसे अपने पास बुला कर समझाती है और जरूरत पड़ने पर उसकी पिटाई करके बच्चों को सुधार देती है, जीवन में माँ से बड़ा कोई कारगर गुरु नहीं होता है। हर माँ अपने बच्चों के प्रति निस्वार्थ भाव से जीवन भर समर्पित रहती है। माँ की ममता व त्याग की गहराई को मापना भी असंभव है और ना ही उनके एहसानों को सात जन्मों तक चुका पाना संभव है। लेकिन हमको ध्यान रखना चाहिए हम हमेशा उनका ध्यान रखे और माता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता को प्रकट करना हमारा कर्तव्य है। उनकी जरूरतों का ध्यान रखना हमारा धर्म है।

दुनिया में माँ के प्रति इन्हीं भावों को व्यक्त करने के उद्देश्य से विश्व में “मातृ-दिवस” मनाया जाता है। यह दिन विशेष रूप से माँ के लिए समर्पित है। इस दिन को दुनिया भर में लोग अपने तरीके से मनाते हैं। कहीं पर माँ के लिए पार्टी का आयोजन होता है तो कहीं उन्हें तरह-तरह के उपहार और शुभकामनाएं दी जाती है। कहीं पर पूजा अर्चना तो कुछ लोग माँ के प्रति अपनी भावनाएं लिखकर जताते हैं। लोगों का इस दिन को मनाने का तरीका चाहे कोई भी हो, लेकिन बच्चों में माँ के प्रति प्रेम और इस दिन के प्रति उत्साह चरम पर होता है जो कि जीवन में हर पल हमेशा बना रहना चाहिए। बच्चों को हमेशा माँ की भावनाओं का आदर करना चाहिए।

जब भी मैं यह सोचता हूँ कि माँ और ईश्वर में कौन बड़ा है, तो यह सोच कर मैं भी बड़ी असंजस में पड जाता हूँ, किसी के भी जीवन में एक माँ, सर्वश्रेष्ठ और सबसे महत्त्वपूर्ण होती है क्योंकि कोई भी उनके जैसा सच्चा और वास्तविक नहीं हो सकता। माँ हमेशा हमारे अच्छे और बुरे समय में साथ रहकर हौसलाअफजाई करती रहती है। माँ शब्द हम सब के जीवन का पहला वो शब्द होता है जिसे हम हर दुःख-दर्द में सबसे पहले लेते है। भगवान का नाम भी इंसान दुःख-दर्द में भूल जाता है मगर व्यक्ति माँ का नाम लेना कभी नहीं भूलता। इसलिए माँ हम सभी के जीवन में बहुत ही अनमोल व महत्वपूर्ण होती है और उसका स्थान साक्षात ईश्वर के बराबर होता है।

विभिन्न ग्रंथों में माँ की महिमा का हमको बखान मिलता है जैसे कि “माँ और बेटे का इस जग में है बड़ा ही निर्मल नाता, पूत कपूत सुने है पर न सुनी कुमाता” ये बेहद प्राचीन वाक्य हमें माँ की महिमा के बारे में बहुत ही अच्छे ढंग से समझा देता है। माँ हमारे जीवन का वो हिस्सा होती है जिसके बिना बेफिक्र से जीवन जीना बहुत कठिन हो जाता है। जब तक बच्चों के सिर पर माँ का हाथ है तबतक बच्चों का उत्साह अलग ही होता है चाहे वो स्वयं ही बच्चे वालें क्यों न हो जाये।

इस “मातृ-दिवस” पर हम सभी को समझ लेना चाहिए कि जिस माँ ने हमको अपनी जान खतरे में डाल के जन्म दिया है, हम कभी भी सात जन्मों में भी उस माँ का ऋण नहीं चुका सकते है, इसलिए हमको इस दिन प्रण लेना चाहिए की हम कभी भी माँ की आँखों में आंसू नहीं आने देंगे।
वैसे भी जीवन में वो बच्चे बहुत ही भाग्यशाली व अमीर होते है जिनकी पास माँ रूपी अनमोल दौलत का आशिर्वाद हमेशा बना रहता है। क्योंकि बिना माँ के ये दुनिया उजड़ी-उजड़ी सी लगती है। मैं कभी-कभी सोचता हूँ की माँ अगर तुम न होती तो मेरा क्या होता इस जालिम दुनिया में मुझे कौन इतना लाड़ प्यार दुलार करता तुम्हारे बिना मेरी कोई अहमियत ना होती, कोई हैसियत ना होती।

किसी भी व्यक्ति के जीवन में माँ के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए एक “मातृ-दिवस” काफी नहीं है बल्कि एक सदी भी कम है। किसी ने ठीक कहा है ना कि “सारे सागर की स्याही बना ली जाए और सारी धरती को कागज मान कर लिखा जाए तब भी माँ की महिमा नहीं लिखी जा सकती”। इसीलिए हर बच्चा कहता है मेरी माँँ दुनिया में सबसे अच्छी है। जबकि दुनिया में माँ, इसकी-उसकी नहीं हर किसी की बहुत अच्छी ही होती है, क्योंकि माँ वह होती है जो हमको इस दुनिया में लाती है। आज “मातृ-दिवस” पर मैं अपनी माता आदरणीया “श्रीमती राजेन्द्री देवी” के साथ-साथ दुनिया की हर माता को उसके अनूठे अनमोल मातृ-बोध की बधाई देता हूँ और उन्हें सादर कोटि-कोटि नमन वंदन करता हूँ। दुनिया में साक्षात नजर आने वाली ईश्वर का रूप माँ को “मातृ दिवस” की बधाई देता हूँ।

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