राजनीति और धर्म

– मनोहर कुमार मिश्र
25 दिसंबर 1893 को कन्याकुमारी में अपने संबोधन में स्वामी विवेकानंद ने कहा कि धर्म राष्ट्र के शरीर का रक्त है। हमारी सभी बीमारियों का कारण रक्त की शुद्धता है यह देश फिर से उभर सकता है यदि इस रक्त को शुद्ध कर दिया जाए यदि एक नजर आधुनिक दार्शनिक विचारों को देखा जाए तो ओशो रजनीश के अनुसार राजनीति का अर्थ होता है। दूसरे को कैसे जीत लो और धर्म का अर्थ होता है स्वयं को कैसे जीत लो ओशो के अनुसार धर्म और राजनीति बड़े विपरीत है। धर्म पहले तो राजनीति अपने आप सिकुड़ जाएगी और धर्म ना फैला तो राजनीति चलती रहेगी। यही कारण है कि धर्म में व्यक्ति खुद को जीता है और राजनीति में सीटों को इसी प्रयास से धर्म की हानी भी होती है परिणाम स्वरूप आज भारत वर्ष के अंदर राजनीति में धर्म को अपना हाल बना लिया है लोकतंत्र की पार्टियां बनाकर जिस प्रकार निजी स्वार्थ के लिए धर्म का सहारा ले रहे हैं।
इससे पता चलता है कि भारतवर्ष एक अंधा युग की तरफ जा रहा है जहां पर धार्मिक सांस्कृतिक और सियासी परिचर्चा बेहद जहरीली हो गई है कहां गया। वह अखंड भारत वर्ष की भूखंड में गंधार कंधार तक्षशिला सिंधु जो पाकिस्तान में है। जैसे क्षेत्र थे महाभारत काल में भी द्वारिकाधीश श्री कृष्ण ने राजनीति चक्र का निर्माण किया वह भी राजनीति को साफ करने के लिए और प्रजा को अत्याचार और उत्पीड़न से बचाने के लिए उस काल में जो भी उचित शृंखल लोग तिलक सत्ताधारी थे। उन सब से एक—एक कर श्री कृष्ण से टक्कर हुई उनके द्वारा सबसे पहला परिवर्तन शूरसेन जनपद की राजनीति में हुआ प्रति वर्ष श्री कृष्ण का संबंध हस्तिनापुर की राजनीति से हुआ। भगवान श्री कृष्ण की राजनीतिक बुद्धि अद्भुत थी परंतु इसका प्रयोग उन्होंने स्वार्थ की राजनीति के लिए नहीं बल्कि प्रजा के हित के लिए किया। वे स्वयं यादव जाति की अंधा कृष्ण शाखा जो एक गणराज्य था उसके सदस्य थे। उस समय उन्होंने अनुभव किया कि प्राचीन लोक परंपराओं के विरुद्ध निरंकुश होकर राजाओं द्वारा राज शक्ति का प्रयोग किया जा रहा है।
जिसके कारण प्रजा 6 और कष्ट में है परिणाम स्वरूप मगध चेदि गंधार कामरूप कामाख्या बाल हिट अंग के कई सिंधु में राजनीतिक परिवर्तन हुआ तो सिर्फ प्रजा के लिए यहां धर्म या स्वार्थ की राजनीति नहीं हुई। व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए किसी विशेष समुदाय को हानी नहीं पहुंचाया गया जाति अथवा वर्ण के आधार पर क्षेत्रों का विभाजन नहीं हुआ। परंतु आधुनिक काल में इसका उपयोग बार—बार किया गया। चाहे 1919 में अफ़ग़ानिस्तान 1956 में तिब्बत 1947 में पाकिस्तान और 1971 में बांग्लादेश इन सब का विभाजन धार्मिक आधार पर व्यक्तिगत राजनीतिक स्वार्थ के लिए किया गया। यही तो है अखंड भारत जो राजनीति के खिलाड़ियों के भक्त हो गए।
अब 21वीं सदी में भी पांव पसार लिया है भाषा धर्म के आधार पर क्षेत्र का मांग कर विभाजन करना चाहते हैं और राजनीतिक पार्टियां सत्ता में धर्म का सहारा बनाकर इसकी आवाज बुलंद करते नजर आते हैं। ताकि सरकार बनाकर आर्थिक दोहन कर सके इसका दुष्प्रभाव भारतीय संस्कृति प्राचीन शिक्षा पद्धति हो या सांस्कृतिक विरासत आजाद भारत में 1947 के बाद भारत वर्ष पूर्ण रूप से यहां की प्राचीन विरासत को बर्बाद कर दिया गया एवं दूसरे धर्म का समर्थन पाने के लिए उसका सहयोग किया गया।
अवसरवादी नेताओं ने सत्ता के लालच में भारतवर्ष की अनमोल विरासत को रूपांतरित करने का प्रयास किया आज भी प्राचीन भारत की आत्मा अपनी व्यथा संस्कृति के विरासत के माध्यम से अपनी हालात को पतला रहा है और बदलाव का बाट जोह रहा है।

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