जो हाथ थामते थे ऑटो के स्टेयरिग, आज बेचते हैं फल

जनमत की पुकार ब्यूरो
हाजीपुर (सुधीर कुमार)।
 कोरोना जैसी महामारी की चेन तोड़ने के लिए लागू किए गए लॉक डाउन ने बहुतों की जिदगी को बदलकर रख दी है। इस लॉक डाउन ने कई छोटे—छोटे कारोबारियों का दिवाला निकाल दिया है। कहते हैं कि वक्त और हालात बहुत कुछ सिखा देता है। कुछ ने वक्ती तौर पर अपना रोजगार बदला और निराशा के अंधेरे से खुद को बाहर निकाल परिवार की गाड़ी खींचने लगे। जो हाथ लॉकडाउन के पहले ऑटो का स्टियरिग थामते थे और दिनभर सवारियों को ढोकर अच्छा पैसा कमाते थे, आज वही हाथ ठेले पर फल बेच रहे हैं। दो पैसे कम आ रहे हैं, पर सुकून इस बात का कि परिवार की गाड़ी खींच रही है।
चकसिकंदर बाजार के ऑटो चालक जयप्रकाश आज ठेले पर कभी सब्जियां और कभी फल बेच रहे हैं। महुआ के परसौनिया हाट से सस्ती सब्जियां खरीदकर लाते हैं और उसे घूम—घूमकर बेचते हैं। माता—पिता सहित सात सदस्यों वाले परिवार की गाड़ी खींचने की जिम्मेवारी 25 वर्षीय जयप्रकाश पर है। भाई भी मदद करता है। दो बहनें हैं। लोन पर ऑटो लिया था। भगवान का शुक्र है कि उसके ऑटो का लोन समाप्त हो गया है। लॉकडाउन में ऑटो चलाना प्रतिबंधित है। अभी 50 रुपये प्रतिदिन के किराये पर ठेला लेकर फल—सब्जी बेचकर दो पैसे कमा रहा है। जयप्रकाश की तरह अभिषेक और ओमप्रकाश हैं। इन्होंने भी अपने आप को संभाला और फिर फल और सब्जी का ठेला सजाकर चल दिए गांव की ओर। इनके भी जीवन की गाड़ी चल पड़ी। घर में दो पैसे आ रहे हैं।
चकसिकंदर बाजार के ही हैं नागेंद्र कुमार ठाकुर। पहले अपने सैलून में बाल कटिग करते थे। उसी से अपने परिवार का भरण पोषण करते थे। लॉकडाउन में सैलून बंद हो गया। लेकिन इन्होंने हिम्मत नहीं हारी और एक नया तरीका खोज निकाला। घर—घर जाकर हाथों ,कैंची, उस्तरा को सैनिटाइज कर बालों का काटना शुरू किया और फिर से अपने परिवार के सदस्यों के चेहरे पर खुशियां ले आए।

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