चुनाव एक माह आगे बढ़ा कर आयोग ने AAP- कांग्रेस को दिया समझौते के धागे जोड़ने का समय!

नई दिल्ली। रविवार को की गई चुनाव आयोग की घोषणा में एक राहत भी है। राहत विपक्ष के लिए है। और अगर चाहें तो कांग्रेस के लिए है और आम आदमी पार्टी के लिए है । पिछली बार 2014 के चुनाव दिल्ली में 10 अप्रैल को हुए थे और इस बार वो थोड़ा – बहुत नहीं एक महीने के लिए आगे हो गए हैं।

यानी दिल्ली में गठबंधन को लेकर जो तनातनी दोनों दलों में चल रही थी , वो अगर चाहें तो निपट भी सकती है। सवाल सिर्फ चाहने का है। अरविंद केजरीवाल और आप हमेशा से चाहते रहे कि कांग्रेस से समझौता हो जाए लेकिन एक मामला एक कदम आगे और दो कदम पीछे होता गया।

 

शुरूआत में आप ने दिल्ली के सीटों के गठजोड़ को पंजाब और हरियाणा तक ले जाना चाहा जो कांग्रेस को किसी भी तरह से मंजूर नहीं रहा। पहले जब तक अजय माकन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे तो वो समझौता विरोधी रहे और शीला दीक्षित समर्थक । लेकिन कुर्सी बदलते ही दोनों ने पाला बदल लिया ।

शीला समझौत विरोधी हो गईं और माकन समर्थक। हफ्ते पहले पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ बैठक में प्रदेश कांग्रेस का सर्वसम्मति का कथित स्टैंड समझौता के विरोध में भारी पड़ा।

राहुल गांधी ने नवोदय टाइम्स और पंजाब केसरी के साथ विशेष साक्षात्कार में भी यही स्पष्ट किया था कि राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते उनकी यह जिम्मेदारी के पूरे विपक्ष को एक करें लेकिन यह प्रदेश इकाई के विरोध के साथ नहीं हो सकता। माना गया कि बातचीत के सभी धागे टूट गए हैं। लेकिन शनिवार को सोनिया गांधी की शीला दीक्षित से मुलाकात ने इस बात को और बल दे दिया कि समझौते की रस्सी के सभी धागे अभी पूरी तरह से टूटे नहीं हैं।

यह याद दिलाने की जरूरत नही है कि पिछली बार दिल्ली की सातों सीटें भाजपा के कब्जे में हो गई थीं। आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविदं केजरीवाल ने बार – बार दिल्ली वालों को समझाने की कोशिश की कि अगर आप और कांग्रेस का वोट बंटा रहा तो दिल्ली में भाजपा को ज्यादातर सीटें मिलने के आसार रहेंगे।

इसीलिए वो कहते रहे कि भाजपा को हराने में आप ही सक्षम है । आप को ही वोट दें। किसी और को नहीं। लेकिन कांग्रेस को लगता है कि उसका आधार अब 2014 वाला नहीं रहा और विभिन्न टीवी सर्वे में आप और कांग्रेस का वोट बैंक बराबर होता दिखाया गया।

यह तय है कि आप की कोशिश है कि भाजपा से उसका हिस्सा छीना जाए और तैयारी में भी वो काफी पहले से लगी है। पर पुलवामा के बाद स्थिति बदलने पर वो इस कोशिश में रही कि समझौता हो जाए। इधर पिछली बार को देखते हुए मतदान की तारीखों को देखते हुए केजरीवाल भी अकेले ही मैदान में लग गए। लेकिन आयोग की चुनाव तारीखों की घोषणा के बाद स्थिति में थोड़े बदलाव की संभावना जरूर बन गई है।

रणक्षेत्र में ट्रायल कुश्ती लडऩे के लिए समय थोड़ा और मिल गया है। सूत्रों के मुताबिक आंंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने इस मामले में राहुल गांधी और बाद में सोनिया गांधी से बात कर समझाया कि समझौता करने में ही भलाई है।

उनका तर्क यह भी रहा  कि जब दिल्ली और उत्तर प्रदेश में चुनाव के लिए गठबंंधन नहीं होगा, तो अन्य राज्यों पर इसका प्रतिकूल असर दिख सकता है।  सोनिया गांधी की शीला दीक्षित से मुलाकात के पीछे यहीं उद्देश्य बताया जाता है। शीला दीक्षित का मानना है कि अगर अभी आप के साथ चुनाव लड़ लिया गया तो 2020 में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए कोई सम्भावना नहीं बचेगी ।

जो वोटर उनकी तरफ आया है , उसके छिटकने का डर ज्यादा है। यूपीेेए चेयरमैन को अभी तक इसका जवाब  नहीं मिला है। लेकिन चुनाव आयोग  की घोषणा के बाद जरूर विचार विनिमय के लिए दोनों दलों आप और कांग्रेस को अपनी – अपनी गणित समझाने का मौका मिल गया है।

https://www.youtube.com/watch?v=Jx6PYwgLMJQ

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