पढ़िए- खूबसूरत तवायफों के कोठों की रौनक के पीछे की अनसुनी कहानी

नई दिल्ली। हुस्न की परतों में, जिंदगी की लीपापोती में और रेशमी लिबास की चमकधमक में हर तवायफ, बाईजी, गायिका और नृत्यांगना सुंदरता की मूरत सी नजर आई, पर उसके गमगीन खंडहर में कभी किसी झांका ही नहीं। गम के उन फफोलों को, लीपापोती की इन मजबूरियों को किसी ने स्पर्श किया ही नहीं, इसलिए वह सिर्फ ‘तवायफ’ नाम बनकर ही सिमट गई। इतिहास के सुनहरे पन्नों में इनका नाम जहां स्वर्णिम अक्षरों में होना चाहिए वहां पुरुषवादी मानसिकता कहें या फिर लैंगिक भेदभाव का शिकार रहीं। यही नहीं, गौर करने वाली बात कि इन्हें समाज में अस्पृश्य ही समझ लिया गया।

नृत्यांगनाएं भरती थीं सबसे अधिक टैक्स

16 से 20 शताब्दी की तवायफ, बाईजी, गायिका और नृत्यांगनाओं की जिंदगी के पन्ने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में पलटे गए। विभिन्न सेशन में ना केवल इनकी उपलब्धियों का बखान किया गया बल्कि उन कारणों की भी पड़ताल की गई कि जिनकी वजह से इतिहास में इन्हें उचित स्थान नहीं मिला। पहले सेशन में प्रोफेसर वीना एवं डॉ लता सिंह ने वुमेन परफॉर्मर पर परिचर्चा में भाग लिया। जिसमें वीना ने कहा कि 1862 में सर्वाधिक इनकम टैक्स और प्रॉपर्टी टैक्स देने वालों की श्रेणी बनाई गई। आपको जानकर हैरानी होगी कि आभूषण विक्रेता दूसरे नंबर पर थे, जबकि पहले नंबर पर नृत्यांगनाएं थीं। तीसरे नंबर पर इनका नृत्य-संगीत देखने वाले दर्शक होते थे। ये शहरी, ग्रामीण इलाकों में मकान समेत फैक्ट्रियों की मालकिन भी होती थीं। सवई एवं मेवाड़ का कारखाना इसकी नजीर हैं। डॉ लता सिंह कहती हैं कि नृत्यांगनाओं के बारे में इतिहास विलुप्त ही है या कहें लिखा ही नहीं गया जबकि बहुत सी प्रसिद्ध शख्सियतों ने इनकी राजनीतिक प्रभुता के बारे में लिखा है। खुद, वीर सावरकर ने नृत्यांगना अजीजन बाई के बारे में लिखा। जो कोठे पर अंग्रेज सिपाहियों के लिए गाने जरूर गाती थीं लेकिन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों संग बैठकें भी करती थीं। 1 जून 1857 को क्रांतिकारियों ने कानपुर में एक बैठक की, इसमें नाना साहब, तात्या टोपे के साथ सूबेदार टीका सिंह, शमसुद्दीन खां और अजीमुल्ला खां के अलावा अजीजन बाई ने भी शिरकत की थी। यहीं इसी बैठकी में हाथ में गंगाजल लेकर इन सबने अंग्रेजों की हुकूमत को जड़ से उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया था। महान क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर ने अजीजन की तारीफ करते हुए लिखा है, अजीजन एक नर्तकी थीं परंतु सिपाहियों को उससे बेहद स्नेह था। इसी तरह बेगम समरु की भी कहानी काफी प्रेरक है। अमृतलाल नागर की किताब ‘ये कोठेवालियां’ में तवायफों की जिंदगी को नजदीक से जाना जा सकता है। गांधी के मूवमेंट में हुस्नबाई, विद्याधारीबाई ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था। लेकिन स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी किताबों में इनका संघर्ष नहीं झलकता। गायिका मल्लिका पुखराज जम्मू से लाहौर चली गईं। जब एक राष्ट्र की परिकल्पना हुई तो तवायफों, बाईजी का जिक्र जरूर होना चाहिए। क्योंकि यही वो औरतें हैं, जिन्होंने भक्ति कलाम, देशभक्ति की भावनाओं को प्रबल किया। तवायफों में मुस्लिम और हिंदू भी होती थीं लेकिन उनके लिए देश पहले था। वीना ने करीब 35 तवायफ के साक्षात्कार के जरिए उनकी जिंदगी में झांकने की कोशिश की। एक साक्षात्कार के दौरान तवायफ के कमरे में कृष्ण की तस्वीर देख पूछ बैठीं कि क्या तुम हिंदू हो? वह बोली, नहीं। लेकिन नृत्य के दौरान कृष्ण की एक झलक जोश का संचार कर देती है। गायिका गौहर जान को कौन भूल सकता है जिन्होंने लिखा कि ‘मदीना में हजरत ने मनाई होली’। यदि इन गानों और इनके अंदर छिपे संदेशों को देखें तो पता चलता है कि इनके लिए देश पहली प्राथमिकता थी। रसूलन बाई का यहां जिक्र करना जरूरी है। वीना कहती हैं कि कुजीन आफ लखनऊ भी एक तवायफ की ही खोज है।

…और उमराव जान बन गई

तवायफों के कोठों की रौनक के पीछे उनकी जिंदगी का एक गमगीन खंडहर होता है जिसके मलबे में तवायफ बनने की दर्दनाक दास्तां दबी होती है। मिर्जा हादी रुसवा की उमराव जान ऐसी ही एक शोख, दिलकश तवायफ की कहानी है जिसके घुंघरुओं की खनक के पीछे दबा है उसका बदनसीब अतीत। सन् 1981 में मुजफ्फर अली के निर्देशन में बनी फिल्म उमराव जान आज भी दर्शकों के दिलों के करीब है।

एक तवायफ पर फिल्म बनाने की क्यों सोची? जब यह सवाल पद्मश्री मुजफ्फर अली से पूछा गया तो उनका कहना था कि लखनऊ मेरे दिल में है। वालिद की सोच और मां के एहसास की वजह से यह फिल्म यादगार बन गई। मैं अलीगढ़ विश्वविद्यालय विज्ञान की पढ़ाई करने लेकिन उर्दू के प्यार में कुछ इस कदर पड़ा कि उमराव जान बनाने की सोच ली। इसके बाद मेरे इस कारवां में आशा भोसले, खय्याम जुड़ते चले गए। हम सुबह एवं शाम साथ बैठते एवं फिर फिल्म के हर सीन, गाने के बोल पर चर्चा कर उसे दिल से लिखते एवं फिल्माते। ‘डांस ऑफ तवायफ’ सेशन में कार्यक्रम की आयोजक मंजरी चतुर्वेदी ने कई ज्वलंत सवाल उठाए। मसलन, उन्होंने कहा कि वो चाहती थी कि इस सेशन में कोई वरिष्ठ कलाकार आए लेकिन जिनसे भी संपर्क किया गया, सबने मना कर दिया। बकौल मंजरी, मैं 20 साल से कथक कर रही हूं। विगत 9 साल से मैं तवायफ का डांस रिक्रिएट कर रही हूं। आज के समय में डांस को जज करने का फार्मूला मिनटों में सैकड़ों डांस स्टेप होते हैं। लेकिन तवायफ के डांस की खासियत उनका ठहराव होता था। जो बहुत ही मुश्किल होता है। दो मिनट में चार मूवमेंट करना बहुत ही मुश्किल होता है। 1892 में दक्षिण भारत में एक मूवमेंट शुरू हुआ जिसमें कहा गया कि ये समाज के लिए काफी हानिकारक है। बाद में जब ये उत्तर भारत आया तो यहां और सख्त हो गया। यहां तो यह कहा गया कि बाईजी खड़ी होकर नहीं नाच सकतीं, सिर्फ बैठकर ही गा-नाच सकती हैं। यह कलाकारों की जीवटता ही रही कि उन्होंने बैठकर भी उतनी खूबसूरती से भावों का प्रदर्शन किया। तवायफ कल्चर को जीवित नहीं किया जा सकता, ना चाहिए, लेकिन हमें उसे आर्ट फॉर्म में मानना जरूर चाहिए। पंडित साजन मिश्र ने कहा कि उस्ताद, पंडित का जिक्र तो इतिहास में मिलता है लेकिन इन बाईजी पर खामोशी है, जो नहीं होनी चाहिए।

तहजीब की नजीर

बनारस में ‘बाईजी की संगीत प्रतिभा’ विषय पर पद्म भूषण पंडित राजन-साजन मिश्र शामिल हुए। जिसमें उन्होंने कहा कि बनारस अद्भुत नगरी है। बना-रस अपने नाम के अनुरूप ही इसमें सभी रस मिले हुए हैं। बनारस में जो भी तवायफ-बाईजी रही हैं वो बहुत ही उच्च कोटि की गायिका थीं। हम उस्ताद, गुरु घराने से जरूर हैं लेकिन हमें यह तहजीब सिखाई जाती थी कि बाईजी का सम्मान करना चाहिए। अपने होश में सिद्धेश्वरी देवी, बड़ी मोती, हुस्नाबाई, नारियल बाजार की मलकाजान, छोटी मोती देवी जी को भी देखा। इन्हें गुरुओं ने अन्य बच्चों की तरह ही शिक्षा दी। हुस्नाबाई को तो सरकार कहकर बुलाते थे। हमारे गुरु जब गंगा से नहाकर लौटते तो इनके इलाके में पूछते हुए निकलते थे। वो नाम लेकर बुलाते ‘का हो टप्पा याद भईल का। ठुमरी क उ लाइन याद बा कि नाहीं।’ दिल्ली से जुड़ा एक प्रसंग बताते हुए राजन मिश्रा ने कहा कि सिद्धेश्वरी देवी राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती थीं। मेरे चाचा पंडित गोपाल मिश्र भी भर्ती थे। देवी को पैरालाइसिस हुआ था, लेफ्ट साइड काम नहीं करता था। बोल नहीं पाती थीं, लेकिन कोई मिलने जाए तो बड़े प्यार से मिलती थीं। लड़खड़ाते हुए कहती ‘करे उ बंदिश याद है’। यदि हम सुना देते तो वो आंचल में बंधा एक रुपया निकाल कर हमें दे देती थीं और कहती कि ‘जा कुछ खा लिह’।

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