बीते पांच वर्षों में बदल गए AAP, भाजपा और कांग्रेस के मुद्दे और कद्दावर सियासी चेहरे

नई दिल्‍ली। बीते पांच वर्षों में भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी में जो जबरदस्‍त बदलाव आया है, उसके बारे में 2014 में शायद किसी ने सोचा भी नहीं था। एक ओर जहां लोकसभा चुनाव के मतदान का पहला चरण बस शुरू ही होने वाला है तो दूसरी ओर दिल्‍ली का सियासी नजारा काफी कुछ बदला हुआ है। सियासी चेहरों से लेकर पार्टियों के घोषणा पत्र तक इस बार सबकुछ अलग है। 2014 से यदि इसकी तुलना करें तो वक्‍त पूरी तरह से बदल चुका है।

कांग्रेस का बदला चेहरा 
बात सियासी चेहरों की पहले हुई है तो दिल्‍ली में ही इस बार तीनों पार्टियों के कई नेता चुनावी हलचल से बाहर हैं। 2014 से यदि इस बार के लोकसभा चुनाव की तुलना करें तो कांग्रेस इस बार दिल्‍ली में अपनी खोई हुई जमीन वापस लेने की जद्दोजहद कर रही है। लेकिन इस जद्दोजहद में उसकी कई नेता जो पिछली बार सुर्खियों में थे, नदारद हैं। इनमें सज्जन कुमार, जो कभी दिल्‍ली में कांग्रेस का बड़ा चेहरा हुआ करते थे, का नाम भी शामिल है। फिलहाल वह जेल की सलाखों के पीछे हैं। इतना ही नहीं पूर्वी दिल्ली से दो बार लगातार सांसद रहे संदीप दीक्षित, जो पूर्व सीएम शीला दीक्षित के बेटे हैं, ने दिल्ली और राजनीति से चले गए हैं। दिल्‍ली में कांग्रेस का एक और बड़ा चेहरा चौ. प्रेम सिंह का निधन हो चुका है। उनकी कांग्रेस के अहम रणनीतिकारों में गिनती होती थी।

भाजपा में हुआ बदलाव 
इसके अलावा भाजपा की बात करें तो वहां भी काफी कुछ बदल चुका है। कभी पार्टी में नंबर दो की भूमिका में रहने वाले लाल कृष्‍ण आडवाणी समेत मुरली मनोहर जोशी को रिटायरमेंट दे दी गई है। वहीं यदि भाजपा के घोषणा पत्र की बात करें तो जहां 2014 में इसके कवर पेज पर पार्टी के बड़े नेता दिखाई देते थे वहीं इस बार पीएम मोदी ही दिखाई दे रहे हैं। इसके अलावा यदि दिल्‍ली की सियासत की बात करें तो राजधानी के सबसे कद्दावर नेता और दिल्‍ली के पूर्व सीएम मदन लाल खुराना का निधन हो चुका है। इसके अलावा कद्दावर नेताओं में शुमार रहे प्रो. वीके मल्होत्रा भी ज्यादा उम्र और खराब सेहत के कारण राजनीति में नहीं हैं। इनके अलावा भाजपा अध्यक्ष रहे ओपी कोहली भी सक्रिय राजनीति से दूर हो चुके हैं और वर्तमान में गुजरात के राज्यपाल हैं। जगदीश मुखी भी फिलहाल असम के राज्यपाल हैं।

बदलाव से नहीं बची आप 
बदलाव की बयार में आम आदमी पार्टी भी इनसे अलग नहीं रही है। आंदोलन से राजनीति की राह पकड़ने वाली इस पार्टी की सूरत 2014 की तुलना में अब काफी कुछ बदल गई है। आप में कभी बड़ी भूमिका निभाने वाले योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण अब इससे अलग हो चुके हैं। योगेंद्र यादव ने स्वराज इंडिया ने नाम से नया दल बना लिया है। 2014 में ‘आप’ के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले कुमार विश्‍वास, आशुतोष, आशीष खेतान, प्रो. आनंद कुमार और राजमोहन गांधी सभी सक्रिय राजनीति से दूर हो चुके हैं। इसके अलावा 2014 में आप से जुड़ने वाले कई दूसरे नेता भी इस बार इससे अलग थलग पड़े हैं। इतना ही नहीं पार्टी के कई मौजूदा विधायक ही पार्टी की नींव खोखली करने का काम कर रहे हैं।

चुनावी वायदों पर भी नजर 
बात घोषणा पत्र की चली है तो आपको बता दें कि कांग्रेस के घोषणापत्र में जहां मतदाताओं के लिए लुभावने वादे हैं, वहीं भाजपा ने अपने संकल्पपत्र में ऐसे वादों से परहेज किया है। पार्टी ने राममंदिर निर्माण, धारा 370, समान नागरिक संहिता जैसे पुराने मुद्दों को फिर से दोहराने के साथ-साथ किसानों के लिए कुछ नई योजनाओं का वादा किया है। इस बार भाजपा के संकल्पपत्र में तीन मुद्दे शीर्ष पर हैं इनमें राष्ट्रीय सुरक्षा, किसान मुद्दा और अर्थव्यवस्था का शामिल है। वहीं कांग्रेस ने काम, दाम और शान के मुद्दे को तर्जी दी है।

किसानों का मुद्दा 
हालांकि यदि कांग्रेस और भाजपा में किसानों के मुद्दे की बात की जाए तो दोनों ही पार्टियां इन्‍हें अपनी तरफ झुकाने के प्रयास में काफी कुछ वादे कर बैठी हैं। ये दोनों पार्टियों के केंद्र में हैं। कांग्रेस ने गरीबों के लिए 72 हजार रुपये की न्याय योजना के अलावा किसानों के लिए कर्जमाफी का एलान किया है। वहीं भाजपा ने किसानों को बिना ब्‍यान के एक लाख का कर्ज देने, किसान सम्मानि निधि का दायरा बढ़ाने, छोटे एवं सीमान्त किसानों को पेंशन देने का वादा किया है। लेकिन इन सभी के बीच रोजगार के मुद्दे पर कहीं न कहीं कांग्रेस वादा करने में जरूर आगे निकल गई है। ऐसा इसलिए क्‍योंकि ने खाली पड़े 22 पदों को भरने का वादा कर यह मुद्दा भाजपा से छीन लिया है। वहीं शिक्षा पर जीडीपी का छह फीसदी खर्च करना, स्वास्थ्य का अधिकार और शिक्षा ऋण पर ब्याज माफ करने जैसे वायदे भी किए हैं।

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