दिल्ली मेट्रो में फ्री यात्रा स्कीम : जानिए- कैसे पीएम मोदी से सबक ले सकते हैं केजरीवाल

नई दिल्ली। दिल्ली सरकार ने विश्व पर्यावरण दिवस से दो दिन पहले घोषणा की कि वह दिल्ली मेट्रो रेल और दिल्ली परिवहन निगम की बसों में महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा की योजना पर विचार कर रही है। हालांकि अभी इसके व्यावहारिक रूप लेने को लेकर कई आशंकाएं जताई जा रही हैं, लेकिन दिल्ली सरकार का कहना है कि दिल्ली मेट्रो रेल निगम के साथ तालमेल के जरिये कोई व्यावहारिक राह निकाली जा सकती है, ताकि इस योजना को अमलीजामा पहनाया जा सके।

पर्यावरण दिवस का उल्लेख यहां पर इसलिए उल्लेखनीय है, क्योंकि पर्यावरण के चिंतनीय हालात, वायु प्रदूषण, सड़कों पर निजी वाहनों की भरमार तथा सड़क पर जाम की समस्या से जूझते लोग आदि मसलों पर जब भी चर्चा चलती है, इसके उपाय ढूंढ़ने की बात चलती है तो सबसे महत्वपूर्ण यही बताया जाता है कि इसका समाधान है सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा, लेकिन क्या इस दिशा में कुछ किया जा रहा है?

ध्यान रहे हर दिन दिल्ली की सड़कों पर करीब 1,400 नई गाड़ियां उतरती हैं, जिनका बहुलांश निजी गाड़ियों का होता है। एक तरफ जहां मोटर वाहन कंपनियां खपत बढ़ाने के चक्क्र में रहती हैं, नई नई स्कीम बनाती रहती हैं, वहीं लोग भी कभी जरूरत की वजह से तो कभी स्टेटस सिंबल के नाम पर निजी गाड़ियां रखने में संकोच नहीं करते। कहने का तात्पर्य कि मेट्रो रेल, बस, लोकल ट्रेनें आदि एक तरफ जहां पर्यावरण के लिहाज से जरूरी हैं, वहीं इसे सुविधाजनक और सस्ता बनाना भी उतना ही जरूरी है, ताकि हर तबके के लोग रोजमर्रा के जीवन को आसान बना सकें।

अब यदि हम महिलाओं के लिए प्रस्तावित मुफ्त यात्रा की बात करें तो इसके पक्ष में इस आधार पर हामी भरी जा सकती है कि इसके चलते सार्वजनिक दायरे में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ सकती है। आज भी यह मुद्दा अहम बना हुआ है कि घर के बाहर के दायरे में उनकी भागीदारी बराबरी की नहीं है। मेट्रो यात्रियों में भी उनकी उपस्थिति 25 से 30 फीसद तक ही बताई जाती है। किसी भी उपाय या बहाने से उन्हें बाहर निकलने के लिए प्रोत्साहन मिले तो उसका लाभ लेकर इस अंतर को पाटना ही चाहिए। अधिकाधिक लड़कियां तथा महिलाएं पढ़ने या नौकरी, व्यवसाय आदि के लिए बाहर आएं तो जेंडरजनित बराबरी के साथ ही सार्वजनिक दायरे में पितृसत्तात्मक वर्चस्व भी टूटेगा। समझना यह है कि यह कदम प्रोत्साहन तो देगा कि आप बाहर निकलें, लेकिन यदि सार्वजनिक परिवहन कैसा होना चाहिए इसकी बात की जाए तो वह निश्चित ही सस्ता और सुलभ सभी के लिए होना चाहिए, यही मांग बनती है। पश्चिमी देशों में सार्वजनिक परिवहन को जबरदस्त सब्सिडी दी जाती है।

उन्होंने इस मामले में अध्ययन करके पता लगाया है कि बिना सब्सिडी दिए उसे सस्ता नहीं किया जा सकता है।

पर्यावरण की बदतर होती स्थिति को देखते हुए तथा निजी वाहनों के प्रयोग को हतोत्साहित करने के लिए पिछले साल यह खबर भी आई थी कि सभी लोगों के लिए मुफ्त सार्वजनिक परिवहन की योजना दुनिया के कई शहरों में जोर पकड़ रही है।

एक शोध अध्ययन में ब्रुसेल्स यूनिवर्सिटी के एक अध्येता ने बताया कि वर्ष 2017 में पूरी दुनिया में मुफ्त सार्वजनिक परिवहन के 99 नेटवर्क कायम थे, जिनमें से 57 यूरोप में, 27 उत्तरी अमेरिका में, 11 दक्षिणी अमेरिका में, तीन चीन में और एक आस्ट्रेलिया में देखने को मिला। फ्रांस के लगभग दो लाख आबादी वाले शहर डंकर्क में पिछले साल यह योजना लागू की गई, जिसने इसकी प्रेरणा इस्तोनिया की राजधानी तालिन से ली थी, जो 2013 में किसी यूरोपीय देश की ऐसी पहली राजधानी बना था जहां बसों और ट्रामों में नगरपालिका में पंजीकृत निवासियों के लिए यातायात मुफ्त कर दिया गया था।

दिल्ली की सार्वजनिक यातायात व्यवस्था को देखें तो वर्ष 2017 में दो चरणों में किराया बढ़ोतरी को लागू किया गया जो पहले से दोगुना हो गया। इससे दैनिक यात्रियों के खर्चे में दोगुनी वृद्धि हुई। ऐसे खर्चे में बढ़ोतरी की सबसे अधिक मार मध्यवर्ग पर पड़ती है। अगर किसी मध्यवर्गीय परिवार में दो बच्चे पढ़नेवाले हों तो ऐसे परिवार पर खर्चा कितना बढ़ा होगा? इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

शायद सरकार यही सोचती है कि दुनिया के अनुभव के विपरीत सार्वजनिक परिवहन के खर्चे को लोगों से ही वसूला जाए। और जब भी किराये में कटौती की बात चलती है तो सरकारें यही दावा करती हैं कि आखिर सरकार इतनी रकम लाएगी कहां से। सरकारों को प्राथमिकता तय करनी होती है कि उसे सरकारी खजाने को कहां खर्च करना है। दिल्ली सरकार का कहना है कि इस मुफ्त यात्र वाली योजना में उसे प्रतिवर्ष 1,200 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे, जो वह कर सकती है। यह बड़ी राशि नहीं है फिर क्यों नहीं सरकार इस दिशा में प्रयास करे कि वह समान रूप से सस्ती यात्रा सभी के लिए उपलब्ध करा दे।

इन दिनों कल्याणकारी राज्य की वापसी की बात की जा रही है, जिसके तहत राहत का दायरा सभी किसानों तक बढ़ाने की, छोटे कारोबारियों व किसानों के लिए पेंशन योजना की बात हो रही है। राहुल गांधी ने भी चुनाव के दिनों में किसानों के लिए ‘न्याय योजना’ का वादा करके किसानों को 72 हजार रुपये देने की बात की थी। सस्ता राशन, सस्ता स्वास्थ्य आदि की चर्चाओं में क्या सस्ता परिवहन की बात पर जोर नहीं दिया जाना चाहिए।

कुछ लोगों ने महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा वाली योजना की कुछ तकनीकी दिक्कतें भी गिनाई हैं कि कार्ड कैसे बनेगा ताकि कोई अन्य इसका दुरुपयोग नहीं करेगा या एएफसी गेट क्या अलग होगा आदि, लेकिन काम तो विशेषज्ञों को करना है। कहा जा रहा है कि सरकार सक्षम महिलाओं से अपील करेगी कि वे सब्सिडी छोड़ दें तो उसका लाभ जरूरतमंदों को मिले। जैसे मोदी सरकार ने गैस सिलिंडर के लिए अपील की थी।

सरकार को करना यह चाहिए कि वह जरूरी चीजों की सूची बना कर सभी के लिए उपलब्ध कराए। अधिक आयवालों को सब्सिडी का लाभ उठाने से वंचित करने के तरीके निकालने चाहिए न कि इसे उनकी सदाशयता पर छोड़ना चाहिए।

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